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    असीम है परमात्मा, अनंत है परमात्मा

    दूसरा प्रश्न:
    भगवान, इस मधुशाला से हम जितना पीते हैं उतना ही कम क्‍यों लगता है? मुझे ऐसा लगता है कि मैं चूकती जाती हूं। इतना आप पिलाते हैं, मैं नहीं पीती हूं। मेरे वश में नही है। क्या यह एक शिकायत की आदत तो नहीं है, कि सच में ऐसा है कि मैं साहस नहीं कर पाती?

    धर्म श्रद्धा,
    साहस तुझमें पूरा है। साहस की कोई कमी नहीं है। श्रद्धा तेरी अनूठी है। तेरा भाव समग्र है। तू यूं ही किसी औपचारिकता से संनन्‍्यासिनी नहीं हो गयी है; हार्दिकता से हुई है। यह समर्पण किसी लोभ में, किसी भय में नहीं हुआ है। यह प्रीति का फूल है।

    लेकिन यह जो परमात्मा का रस है, यह रस ही ऐसा है : कितना ही पीओ, फिर भी पीने को शेष रह जाएगा। कितना ही जानो, फिर भी जानने को शेष रह जाएगा। इस मधुरस को पीने से प्यास बुझती नहीं, बढ़ती है। यह तेरा कसूर नहीं। यह तेरी परवशता भी नहीं। यह तो शराब का ही गुण है कि पीने से और प्यास बढ़ेगी, और सघन होगी, और बढ़ती जाएगी। इसका कोई अंत नहीं है। इसलिए तो परमात्मा को अनंत कहते हैं।

    तू कहती है : “इस मधुशाला से हम जितना पीते हैं उतना ही कम क्‍यों लगता है?” जितना-जितना पीएगी उतना-उतना कम लगेगा। क्‍योंकि जितना जानोगे उतना ही पाओगे कि कितना अनंत जानने को शेष पड़ा है। अज्ञानियों को लगता है : सब जान लिया; ज्ञानियों को लगता है : क्‍या खाक जाना! अभी तो क ख ग भी नहीं पढ़े। अज्ञानियों को लगता है : उस पार पहुंच गये; ज्ञानियों को लगता है : अभी तो यही पार छूटा है, अभी दूसरा पार तो दिखाई भी नहीं पड़ता। सच पूछो तो दूसरा पार है ही नहीं। इस पार से छूटे कि फिर मझधार ही मझधार है। फिर तुम अनंत में प्रवेश करोगे, जिसका कहीं कोई पारावर नहीं है।

    पीओ, जी भर कर पीओ! मगर इस आशा में मत पीना कि तृप्ति हो जाएगी। जिससे तृप्ति हो जाए वह साधारण बात है। जिससे तृप्रि हो ही न और अतृप्ति सघन होती चली जाए, एक दिन तुम प्यास ही प्यास रह जाओ, तो ही जानना कि परमात्मा के द्वार पद दस्तक पड़ी है; तो ही जानना की प्रार्थना उठी है, पूजा का थाल सजा है।

    शुभ हो रहा है, श्रद्धा। शिकायत का कोई सवाल नहीं है इसमें। मगर तुझे लगता होगा कि कहीं ऐसा नहीं है कि मेरी शिकायत की आदत हो गयी है, इसलिए यह शिकायत कर रही हूं। नहीं, शिकायत का कोई सवाल नहीं है। जो भी पीएंगे, उन सभी को ऐसा अनुभव होगा। और पहले ऐसा ही लगेगा। यह भी शुभ लक्षण है कि अपनी ही कोई भूल होगी, कि अपने ही साहस की कमी होगी, कि अपनी ही शिकायत की आदत होगी। न साहस की कमी है, न शिकायत की आदत है। यह परमात्मा का लक्षण है कि हम उसे पीएंगे, उतना ही पीने को और-और! एक रहस्य का द्वार खुलेगा, और-और द्वार खुल जाएंगे। अंतहीन रहस्यों की शृंखला है। एक दीया जला कि फिर जलते ही चले जाते हैं दीयों पर दीये! फिर यह पूरी दीवाली है। फिर अंत नहीं आता इस पंक्ति का। फिर ये दीए कहीं समाप्त नहीं होते। असीम है परमात्मा, अनंत है परमात्मा। अगाध है, अपार है, अगम है!

    उड़ियो पंख पसार
    अध्याय 9
    ओशो