logo

    Thank you for choosing our Product

    You May also Call Us for the Further Information regarding the Product

    call Us on +977 - 9876543210

    तुम्हें रंगने के धंधे में ही लगा हूं

    दूसरा प्रश्न:

    कान्हा! आज अंतिम होली है; क्या होली नहीं खेलोगे?

    राधा! होली ही खेल रहा हूं। कभी होली, कभी होला। चौबीस घंटे वही चल रहा है, । रंगरेज ही हो गया हूं। काम ही कुछ और नहीं कर रहा। जो आदमी मुझे दिखता है, बस मैं उसे रंगने में लग जाता हूं। इसलिए जो रंगे जाने से डरते हैं, वे मेरे पास ही नहीं आते। वे दूर-दूर रहते हैं। कहीं रंग की कोई बूंद उन पर न पड़ जाए! मैं अपने रंग में ही तुम्हें रंग रहा हूं। यहां होली वर्‌॒ष में एकाध दिन नहीं आती, होली ही चलती है। सब दिन एक से हैं। और सब दिन रंगने का काम ऐसे ही चलता रहता है। एकाध दिन होली क्‍या खेलनी! एकाध दिन होली खेलने के पीछे भी मनोविज्ञान है। यह जो एक दिन की होली है, इस तरह के उत्सव सारी दुनिया में हैं-अलग-अलग ढंग से, मगर इस तरह के उत्सव हैं। यह सिर्फ इतना बताता है कि मनुष्यता कितनी दुखी न होगी। एक दिन उत्सव मनाती है, और तीन सौ पैंसठ दिन शेष–दुखी और उदास। यह एक दिन थोड़े मुक्त-भाव से नाच-कृद लेती है। गीत गा लेती है मगर यह एक दिन सच्चा नहीं हो सकता। क्‍योंकि बाकी पूरा वर्ष तो तुम्हारा और ही ढंग का होता है। न उसमें रंग होता है, न गुलाल होती है। तुम पूरे वर्ष तो मुर्दे की तरह जीते हो और एक दिन अचानक नाचने को खड़े हो जाते हो! तुम्हारे नाच में बेतुकापन होता है। तुम्हारे नाच में जीवंतता नहीं होती। जैसे लंगड़े-लूले नाच रहे हों, बस वैसा तुम्हारा नाच होता है। या जिनको पक्षाघात लग गया है, वे अपनी-अपनी बैसाखी लेकर नाच रहे हैं, ऐसा तुम्हारा नाच होता है। तुम्हारा नाच जब मैं देखता हूं, होली इत्यादि के दिन, तो मुझे शंकर जी की बरात याद आती है। तुम्हें नाच भूल ही गया है। तुम्हें उत्सव का अर्थ ही नहीं मालूम है। इसलिए तुम्हारा उत्सव का दिन गाली-गलौज का हो जाता है। जरा देखो, तुम्हारे गैर-उत्सव के दिन औपचारिकता के दिन होते हैं, शिष्टाचार-सभ्यता के दिन होते हैं और तुम्हारे उत्सव का दिन गाली-गलौज का दिन हो जाता है! यह गाली-गलौज तुम भीतर लिए रहते होओगे, नहीं तो यह निकल कैसे पड़ती है? यह होली के दिन अचानक तुम गाली-गलौज क्यों बकने लगते हो? और रंग फेंकना तो ठीक है, लेकिन तुम नालियों की कीचड़ भी फेंकने लगते हो। तुम कोलतार से भी लोगों के चेहरे पोतने लगते हो। तुम्हारे भीतर बड़ा नरक है। तुम उत्सव में भी नरक को ले आते हो। और तुम्हारा उत्सव जल्दी ही गाली-गलौज में बदल जाता है। देर नहीं लगती! तुम्हारी असलियत प्रकट हो जाती है।

    तु्हारा शिष्टाचार, तुम्हारी औपचारिकताएं सब थोथी हैं, ऊपर-ऊपर हैं। गाली ज्यादा असली %ALS